ललितपुर, 25 जुलाई — उत्तर प्रदेश साहित्य सभा के तत्वावधान में अमर क्रांतिकारी चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ की 119वीं जयंती के अवसर पर ललितपुर में एक भावपूर्ण काव्य गोष्ठी और वैचारिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन वरिष्ठ कवि और राष्ट्रवादी विचारक वीरेन्द्र ‘विद्रोही’ के साहित्यिक प्रतिष्ठान पर संपन्न हुआ, जिसने साहित्य और शहादत के मिलन का एक ऐतिहासिक क्षण रचा।
इस गरिमामय कार्यक्रम में साहित्य जगत के प्रतिष्ठित कवियों और विचारकों ने भाग लिया और राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत रचनाओं के माध्यम से चंद्रशेखर आज़ाद को श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम संयोजक महेश ‘मास्साब’ ने उद्घाटन भाषण में कहा, “आजाद केवल इतिहास नहीं, हमारे अंतर्मन में जीवित विचार हैं। उनकी आत्मगौरव की भावना आज भी हमारे संघर्षों का प्रेरणास्त्रोत है।”
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि सुदेश सोनी ने अपनी भावभीनी कविता के माध्यम से शहीदों की कुर्बानी को स्मरण किया, जबकि राष्ट्रवादी कवि शीलचन्द्र जैन शास्त्री ‘शील’ ने आज़ाद के तेजस्वी व्यक्तित्व को ओजपूर्ण काव्य में प्रस्तुत किया। उनकी पंक्तियाँ “स्वाभिमान की दिव्य दीप्ति प्रसारी जैसे दिनकर ने…” ने श्रोताओं को गहराई से आंदोलित किया।
कवि पुरुषोत्तम नारायण पस्तोर ने आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में चंद्रशेखर आज़ाद की प्रासंगिकता को रेखांकित किया, वहीं गीतकार अखिलेश सांडिल्य ‘अखिल’ ने मधुर गीतों के माध्यम से देशभक्ति को नई संवेदना दी।
कार्यक्रम के आयोजक वीरेन्द्र ‘विद्रोही’ ने अपनी मार्मिक कविता “देश की सुरक्षा हेतु, पापा मेरे जाना तुम…” के माध्यम से एक बच्चे की मासूम भावना के ज़रिए राष्ट्र की सामूहिक पीड़ा और उम्मीद को स्वर दिया।
संचालन कर रहे शीलचन्द्र ‘शील’ ने कहा, “हमें साहित्य को राष्ट्र निर्माण का औजार बनाना होगा। ऐसे आयोजनों से हम न केवल श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को देशभक्ति का पाठ भी पढ़ाते हैं।”
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान और एक संकल्प के साथ हुआ कि चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ के विचार और आदर्श सदा जीवित रहेंगे।
यह आयोजन मात्र एक साहित्यिक संध्या नहीं रहा, बल्कि वह मंच बना जहाँ कवियों ने कलम से कसम खाई कि आज़ादी की भावना को न मरने देंगे, न मिटने देंगे।






